Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 144, Verse 54
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 144, verse 54 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 144 · श्लोक 54
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हिन्दी अर्थ
इसलिए परिशेष रहने से यदि ज्ञान ही ज्ञेय है तो यह प्रपंच ज्ञान से अतिरिक्त स्थित
नहीं हे । इस प्रकार सकल वस्तुओं के ज्ञानरूप सिद्ध होनेपर यह द्रष्टा आत्मा के अज्ञान से ही अपने
ज्ञप्तिस्वभाव से च्युत होता है, वस्तुतः नहीं