Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 144, Verse 55
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 144, verse 55 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 144 · श्लोक 55
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हिन्दी अर्थ
इसलिए जो ज्ञान है वही ज्ञेय है, क्योकि ज्ञान
से अतिरिक्त ज्ञेय का संभव नहीं हे, अतः ज्ञान ज्ञेय जगदात्मता का अपने से ही विस्तार करता
हे