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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 144, Verses 56–57

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 144, verses 56–57 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 144 · श्लोक 56,57

इस समूह का संस्कृत श्लोक-संरेखण अभी परिष्कृत किया जा रहा है; नीचे इसका हिन्दी अर्थ दिया गया है।

हिन्दी अर्थ

जिनकी पृथक्‌ सत्ता नहीं है ज्ञानरूप से ही जो सत्तावाले हैं ऐसे सर्गो को देख रहे तत्त्वज्ञानी के रूपादि का ग्रहण कर रही चक्षु आदि सृष्टियाँ ओर उनसे मिल रही रूपादि सृष्टियाँ भी ज्ञान से अतिरिक्त कुछ नहीं हैं, यही तत्त्व है, किन्तु मूर्खजनों को ज्ञात जो सृष्टियाँ हैं, उनके विषय में मैं कुछ नहीं जानता, क्योंकि उनका दृष्टिकोण ही दूसरा हे । तत्त्वज्ञानी की दृष्टि में ज्ञानवश घट, पट आदि सकल पदार्थ एक चिन्मात्र चिदाकाश ही हैं, उससे अतिरिक्त उनका कुछ अस्तित्व ही नहीं है, किन्तु अज्ञ जीवों की दृष्टि मे द्वैतज्ञानवश चिन्मात्र चिदाकाश ही सहस्रो रूप धारण करता है