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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 144, Verses 58–62

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 144, verses 58–62 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 144 · श्लोक 58-62

इस समूह का संस्कृत श्लोक-संरेखण अभी परिष्कृत किया जा रहा है; नीचे इसका हिन्दी अर्थ दिया गया है।

हिन्दी अर्थ

देखिये न, एक चिन्मात्र ही स्वप्न में लाखों लाखों रूप बनकर रहता है स्वप्न से सुषुप्ति मेँ जाकर वह लाखों रूपवाला एक चिन्मात्र हो जाता हे । चिदाकाश में जो स्वप्न संवित्‌ है वही जगत्‌ कहलाता है, चिदाकाश के विषय में जो सुषुप्ति है वही प्रलय है, इसलिए यही न्याय उत्तम है । एक ही संवित्‌ भोग्यरूपसे विविधता तथा भोक्ता के रूप से लाखों मनुष्यों के रूप में वैसे ही प्रकट होती है जैसे कि स्वप्न ओर संकल्प में एक ही संवित्‌ पदार्थो के रूप में ओर शून्यता के रूप में व्यक्त होती है । वैसे ही अमूर्तं होने के कारण प्रतिघात करने योग्य यह सब एकमात्र शुद्ध ज्ञान ही है, जहाँपर जैसा भान हो जाता है वहाँपर वैसा होता है । एक ही संवित्‌ सृष्टि के आदि में अग्नि, जल, आकाश आदि होती है, सृष्टि की सिद्धि के लिए वही स्वप्न ओर संकल्प की तरह पृथिवी आदि होती है