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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 144, Verses 67–71

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 144, verses 67–71 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 144 · श्लोक 67-71

इस समूह का संस्कृत श्लोक-संरेखण अभी परिष्कृत किया जा रहा है; नीचे इसका हिन्दी अर्थ दिया गया है।

हिन्दी अर्थ

अदृढ (निर्बल) संकल्प अदृढ ही मनोरथमय दिगन्तगमन और वहाँ के पदार्थो का दर्शन आदि करता है और दृढ़ संकल्प दढ मनोरथमय दिगन्तगमन और वहाँ के पदार्थो का दर्शन करता है, इससे अदृढ संकल्प भी मोघ नहीं है, ऐसा कहते हैं। तुम मन से पूर्वं ओर पश्चिम दिशा को जाते हो वहाँपर वहाँ के तरह तरह के पदार्थो का चिरकालतक अनुभव करता हुआ जो संकल्पकर्ता है वह संकल्पित दिशा में गमन तथा वहाँ के पदार्थो के अभेद को अपने संकल्प के अनुसार प्राप्त होता है, अन्य पुरुष तो संकल्प का त्यागकर अन्य दिशा को मन से भी नहीं जाता | इसी अन्तर से वहाँपर चित्‌ अविनाशी है । संकल्पित अमुक पदार्थ मैं होऊँ इस प्रकार संकल्प से अविचल निश्चयवाले पुरुष का संकल्पित अभीष्ट पदार्थ पहले प्रातिभासिक फिर संकल्प की दुढता होनेपर व्यावहारिक दोनों ही होता है यह बात एेन्दवोपाख्यान में देखी गई हे । दूसरे पुरुष का जो कि संकल्प नहीं करता है भले ही वह स्वात्मा मेँ अथवा अन्य विषय में अडिग निश्चयवाला हो, उसके दोनों ही प्रातिभासिक और व्यावहारिक नष्ट हो जाते हैँ यानी नहीं दिखाई देते । इरी प्रकार मैं दक्षिण देश उत्तर दिशा को जाऊँ यों अडिग निश्चयवाले संकल्पयिता पुरुष के मानसिक और शारीरिक दोनों ही अर्थ प्राप्त होते हैं, लेकिन अन्य के असंकल्पयिता के भले ही वह अडिग निश्चयवाला हो, दोनों का पूर्व पश्चिम दिग्गमन का नाश हो जाता हे । मैं आकाश में नगर बनूँ, ओर भूमि में मृग होऊँ इस तरह के अविचल निश्चयवाले के दोनों संकल्प सिद्ध हो जाते हैं और इसके अतिरिक्त दोनों का नाश हो जाता है, क्योकि उन दोनों का जगत्‌ भिन्न भिन्न हे । प्रबोधवश सब कुछ एक अखण्ड चिन्मात्र आत्माकाश ही है अज्ञानवश अनेक (द्वैत) ज्ञान से एकमात्र अखण्ड चैतन्य अज्ञानी जीवों की दृष्टि में अनन्त हो जाता है