Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 144, Verse 72
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 144, verse 72 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 144 · श्लोक 72
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हिन्दी अर्थ
यदि चित् ही शरीर आदि के आकार से विद्यमान है तो शरीर के विनाशी या साकार होने से चित् में
भी विनाशित्व अथवा साकारता की प्राप्ति हुई, ऐसी शंका उठनेपर कहते है ।
शरीर चाहे विनाशी या साकार हो चाहे अविनाशी या निराकार हो यह स्वप्नात्मक संसार इस लोक
में और परलोक में जीव का ही हे चित् का नहीं हे । भाव यह है कि चिद्रूप से शरीर अविनाशी ही हो अथवा
अन्यरूप से विनाशी हो इससे चित् में कोई भी आँच नहीं आ सकती, कारण कि मिथ्या पदार्थ के गुण-
दोषों से अधिष्ठान में कुछ भी दूषण नहीं आ सकता