Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 145, Verse 13
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 145, verse 13 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 145 · श्लोक 13
संस्कृत श्लोक
हिमवच्छुभ्रशृङ्गाणि सौधानि शिशिराण्यलम् ।
सुधावधौतभित्तीनि कृतानीन्दुतलैरिव ॥ १३ ॥
हिन्दी अर्थ
यह जाग्रतसृष्टिरूप जगत् भी सृष्टि के आरंभ में
चिदाकाशरूप स्वच्छ स्वप्नप्रतिभा के समान विकास को प्राप्त होता है, यह जगत् उससे अतिरिक्त
कुछ सिद्ध नहीं होता