Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 145, Verse 14
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 145, verse 14 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 145 · श्लोक 14
संस्कृत श्लोक
शिशिरासारहेमन्तप्रावृण्मेघवृतानि च ।
स्थलानि नीलनलिनीलताशाद्वलवन्ति च ॥ १४ ॥
हिन्दी अर्थ
(सर्वथा भावाभावेषु“ इत्यादि विविध प्रकार से कही गई उक्तियो' के सिद्धान्तभूत निष्कर्ष को इकट्ठा
कर कहते है ।
इन शक्तियों से ब्रह्म ही जगत् के रूप से भासित होता है, यह उक्ति सिद्ध होती हे । वह नवीन
भासित यानी पहले नहीं भासित हुआ किन्तु अनादिभारूप यानी उससे अभिन्न जगत अनादि ब्रह्म ही
है, यह तात्पर्य निष्पन्न हुआ