Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 145, Verse 15
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 145, verse 15 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 145 · श्लोक 15
संस्कृत श्लोक
पुष्पप्रकरसंछन्ना विश्रान्तहरिणाध्वगाः ।
स्निग्धपत्रतरुच्छायाः पुरोपवनभूमिकाः ॥ १५ ॥
हिन्दी अर्थ
वह परमात्मा ही कारण और कार्य भी कहा गया है, क्योकि वही
पूर्ववर्ती सामान्यरूप कारण है ओर वही विशेषरूप कार्य है । कार्य संस्कार का आधार यह आत्मा ही
"कारणं सम्यक् करोतीति कार्यम्” इस व्युत्पत्ति से संस्कार कहा गया है "सम्यक् करणं संस्कारः* व्युत्पत्ति
से कृतिरूप संस्कार भी आत्मा ही कहा जाता है