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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 145, Verses 16–17

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 145, verses 16–17 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 145 · श्लोक 16,17

संस्कृत श्लोक

कदम्बकुन्दमन्दारमकरन्देन्दुकान्तिभिः । भासमानासनस्थानसंस्थानाः कुसुमस्थलीः ॥ १६ ॥ नलिनीजालिनीर्नीलाः पुष्पकस्थलधारिणीः । वनावलीर्विलीनाभ्रनिर्मलाकाशकोमलाः ॥ १७ ॥

हिन्दी अर्थ

स्वप्न आदि में जाग्रतूपदार्थो से विलक्षण और जाग्रत्‌पदार्थो का दृष्टान्तभूत जो पदार्थ प्रतीत होता है, वही सूक्ष्म होने से संस्कार, वासना, राग, द्वेष, इच्छा आदि नाम से कहा गया हे । उससे अन्य कोई संस्कार नामक बाह्य पदार्थ चित्त में स्थित नहीं हे । वह संस्कार नाम की वस्तु स्वप्न में दृष्टिगोचर होती है, जाग्रत में नहीं होती । अदर्शनमात्र से जाग्रत्‌ में वह नहीं हे, ऐसा समझना भूल है, क्योकि चित्ताकाश में जैसे चेतना सदा रहती है, वैसे ही वह भी (संस्कार नाम की वस्तु भी) सदा रहती हे । वह शून्यस्वरूप होती हुई भी साक्षिस्वभाववश स्वप्न में प्रतीत होती है ओर जाग्रत में दृष्ट पदार्थो की तरह अत्यन्त विस्तार को प्राप्त होती हे