Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 145, Verse 23
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 145, verse 23 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 145 · श्लोक 23
संस्कृत श्लोक
पित्तात्मना रसेनान्तर्जीव आपूर्यते यदा ।
ओजोन्तरणुमात्रात्मा तदा तत्रैव विन्दति ॥ २३ ॥
हिन्दी अर्थ
एक ही चिदाकाश अपने शुद्ध, बुद्ध, मुक्त स्वरूप का त्याग किये
बिना ही जो स्वप्न की तरह साकारता और अनेकता धारण करता है, वह जगत् है