Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 145, Verse 22
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 145, verse 22 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 145 · श्लोक 22
संस्कृत श्लोक
धराभरकरालाङ्गधाराधरधराधराः ।
दिशः सीकरनीहारहारोदरधरा दश ॥ २२ ॥
हिन्दी अर्थ
चिदाकाश
में जो स्वप्न प्रतीति है वही जगत् कहलाता है, चिदाकाश में जो सुषुप्ति है वही प्रलय कहलाता है,
इसलिए यही न्याय समुचित है