Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 145, Verse 28
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 145, verse 28 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 145 · श्लोक 28
संस्कृत श्लोक
प्रतरन्मृगतृष्णाम्बुसरत्सारसरूपि च ।
स्थलान्यदृष्टपूर्वाणि भूतपूर्वतरूणि च ॥ २८ ॥
हिन्दी अर्थ
गुरु और शास्त्र द्वारा उक्त युक्तयो से कैसा ज्ञान होता है, यह पूछनेपर उसको अपने अनुभव
कथन द्वारा समञ्ाते हैँ ।
मैं समस्त जगताकार परमाणुरूप हूँ, इसलिए मैं सर्वत्र ही ओर तो क्या परमाणु के अन्दर तक
स्थित हूँ