Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 145, Verse 30
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 145, verse 30 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 145 · श्लोक 30
संस्कृत श्लोक
ज्वरज्वालितमाकारं भुवनं तप्तमग्निवत् ।
पांसूपहतदेशानि दिङ्मुखानि च खानि च ॥ ३० ॥
हिन्दी अर्थ
चित्परमाणुरूप (शोधित त्वं पदार्थरूप) मैं चित्परमाणु के
(शोधित तत्पदार्थ ब्रह्म के) साथ उसके ज्ञान से वैसे ही एकभावापन्न हुआ हूँ जैसे जल जलके साथ
एकभावापन्न होता है, क्योकि भगवती श्रुति कहती है - यथा जलं जले क्षिप्तम्“ (जैसे जल में छोड़ा
गया जल, दूध में छोड़ा गया दूध और धृत में छोडा गया धृत अपनी पृथक् सत्ता का त्याग कर देता है वैसे
ही परमात्मा में मिला हुआ जीवात्मा अपना पृथक् अस्तित्व छोड देता है