Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 145, Verse 36
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 145, verse 36 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 145 · श्लोक 36
संस्कृत श्लोक
उड्डीयमानमात्मानं शिलाः शैलस्थलानिव ।
घनघुंघुमसारावानचक्रभ्रमणादि च ॥ ३६ ॥
हिन्दी अर्थ
अन्त में ब्रह्मअद्वैत की सिद्धि द्वारा अकारण पक्ष का ही समर्थन कर रहे मुनि उत्तर देते हैं।
आरम्भ में यह सृष्टि विना कारण के ही प्रवृत्त होती है, क्योकि सृष्टि के आरम्भ में सकल कारणों
का अभाव है, अतः चिदाकाश ही सृष्टिरूप है