Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 145, Verse 37
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 145, verse 37 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 145 · श्लोक 37
संस्कृत श्लोक
हयोष्ट्रगरुडाम्भोदहंसयानावरोहणम् ।
यक्षविद्याधरादीनां गत्यागमनसंचरम् ॥ ३७ ॥
हिन्दी अर्थ
इस सृष्टि मेँ निष्कारण पदार्थो का अत्यन्त
असंभव होने से अकारण किसी स्थूल सर्ग की कहींपर भी किसी प्रकार संभावना नहीं है। हौ, प्रातिभासिक
मिथ्याभूत सर्ग में वह सकारण ही हो, ऐसा नियम नहीं हे