Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 145, Verse 49
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 145, verse 49 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 145 · श्लोक 49
संस्कृत श्लोक
प्राग्भटोद्भटभेदोत्थैर्मन्द्रैर्मरमरारवैः ।
क्रूराक्रन्दैरिवाभाति विराजितजगत्र्त्रयम् ॥ ४९ ॥
हिन्दी अर्थ
अविद्वान् की दृष्टि मेँ अकारण ब्रह्म का
सृष्टिरूप से भी भान होता है ओर उसी के प्रति यह कार्यकारण दृष्टिरूप भ्रान्ति भासित होती है