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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 145, Verses 50–51

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 145, verses 50–51 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 145 · श्लोक 50,51

संस्कृत श्लोक

इति तैः काष्ठपाषाणमृद्युग्वातभटैर्वृतः । परिपीडित एवास्ते यदा जीवो जडीकृतः ॥ ५० ॥ मृदन्तःकीटकणवच्छिलान्तर्गतभेकवत् । गर्भस्थापक्वशिशुवत्फलान्तर्गतबीजवत् ॥ ५१ ॥

हिन्दी अर्थ

विवेकी पुरुष की दृष्टि में तो काकतालीय के समान स्थित इस सृष्टि में केवल पूर्वापरभाव का नियम देखने से यह घट आदि दण्ड, चक्र, मिट्टी आदि सामग्री से उत्पन्न हुआ, यह वर्त्र आदि तुरी, वेमा आदि से इस प्रकार का उत्पन्न हुआ इस तरह पर्यालोचन से नित्यवेद के पद, वाक्य, व्याकरण आदि के नियम से समान यह नियति स्थित है। जन्य पदार्थो में पूर्वापरक्रम अवश्यम्भावी हे, इसलिए वे कारणयुक्त ही हैं, ऐसा जो मानता है उसके मतानुसार जाग्रत ओर स्वप्न में दिखाई देनेवाले अकारण पदार्थो का संभव नहीं हो सकता । क्योकि स्वप्न ओर सुषुप्ति दोनों में से एक के बाद हुए जाग्रत प्रपंच की उत्पत्ति में भी कोई कारण नहीं है । इसी प्रकार जाग्रत्‌ और सुषुप्ति-इन दोनों के बाद हुए स्वप्न प्रपंच की उत्पत्ति में भी कारणों का निरूपण नहीं हो सकता। इसलिए उनके मत में स्वप्नप्रपंच का भी संभव नहीं है