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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 145, Verse 5

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 145, verse 5 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 145 · श्लोक 5

संस्कृत श्लोक

जीवनेत्राणीन्द्रियाणि यदा बाह्यमयान्यलम् । तदा बाह्यात्मकं वेत्ति चिति जीवो जगद्वपुः ॥ ५ ॥

हिन्दी अर्थ

यह सम्पूर्णं जगत्‌ असत्‌ होता हुआ भी स्वप्न के समान अनुभव में आता है । यदि जगत्‌ नहीं है एेसा जगत्‌ का अपलाप कीजिये तो सम्पूर्ण चित्‌ ही इस तरह विकास को प्राप्त होता है