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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 145, Verses 1–4

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 145, verses 1–4 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 145 · श्लोक 1-4

संस्कृत श्लोक

मुनिरुवाच । बहिष्ठैर्बाह्यमेवान्तरन्तस्थैः स्वप्नमिन्द्रियैः । जीवो वेत्ति द्वयस्थातितीव्रसंवेगिभिर्द्वयम् ॥ १ ॥ यदेन्द्रियाणि तिष्ठन्ति बाह्यतश्च समाकुलम् । तदा म्लानानुभवनः संकल्पार्थोऽनुभूयते ॥ २ ॥ यदा त्वन्तर्मुखान्येव सन्त्यक्षाणि तदा जगत् । अणुमात्रं स्ववपुषि जीवस्तेनातिवेत्ति तत् ॥ ३ ॥ जगप्सप्रतिघं नास्ति किंचिदेव कदाचन । जीवेक्षणानामक्षाणां दृष्टिरप्रतिघा जगत् ॥ ४ ॥

हिन्दी अर्थ

विवर्तं के समान अन्य रूपता को प्राप्त होता है । जिसी समय भूमि, जल, आकाश, शेल आदि यह जगत्‌ क्षणभर में असत्‌ होता है उसी क्षण, लव, त्रुटि आदि अवयवों के वृत्तान्तो से विद्वानों ने युग, कल्प आदि संज्ञाएँ की हैं