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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 144, Verses 75–83

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 144, verses 75–83 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 144 · श्लोक 75-83

इस समूह का संस्कृत श्लोक-संरेखण अभी परिष्कृत किया जा रहा है; नीचे इसका हिन्दी अर्थ दिया गया है।

हिन्दी अर्थ

पिशाच को देखना उसके साथ बातचीत करना यह सब जीवित भूतवेद्य का ही धर्म है आगमन या संभाषण मरे हुए का धर्म नहीं है इस तरह की चार्वाक-कल्पना का खण्डन करते है । पिशाचदर्शन, उसके साथ संभाषण आदि यदि जीवित भूतवैद्य का धर्म है तो जो वस्तुतः मरा नहीं पर जिसके मरने का असत्य समाचार प्राप्त हो गया उसके विषय में इस प्रकार का दर्शन, संभाषण आदि व्यवहार क्यों नहीं होता ? जीवधर्म वह भ्रम यदि सत्य है तो मृतधर्म वह संभाषण आदि भ्रम क्यों सत्य नहीं है ? पदार्थ की सिद्धि में अनुभव को ही श्रेष्ठ प्रमाण माननेवालों का जीवित में जैसा अनुभव है, मृत में भी वह समान ही ह । इस प्रकार दोनों न्यायो के समान होने पर दोनों में कौन-सा अन्तर है ? इस तरह अनुभव को यदि पदार्थसिद्धि में प्रमाण मानो तो जाग्रत और स्वप्न के अनुभव जब तक बाध न हो समानरूप से अर्थसाधक हैँ प्रबोध द्वारा केवल अनुभव ही अवशिष्ट रहता है इस प्रकार स्वप्न के समान जाग्रद्‌-भान है ऐसी जो पहले प्रतिज्ञा की गई हे वह अक्षुण्ण है । इससे विद्वानों के अनुभवों की ओर वाचारम्भणं विकारो नामधेयं मृत्तिकेत्येव सत्यम्‌ (विकार वाचारम्भण नाममात्र है मृत्तिका ही सत्य है) इत्यादि शास्त्रों की एकवाक्यता है, परस्पर संवाद से ऐकमत्य ह । जैसे चन्द्रमण्डल को देख रहे बहुत से लोगों की दृष्टिर्यो आपस में एक दूसरे के दर्शन में बाधा नहीं डालती यानी परस्पर प्रतिघातशून्य हैं वैसे ही किसी की दृष्टि मेँ सत्‌ ओर किसी की दृष्टि में असत्‌-इस प्रकार का यह जगत्‌ भी वैसे ही परस्पर प्रतिघातशून्य हे । चिदाकाश में सन्मात्र के ही अंशो का अनुगमन करनेवाला निर्मल अनुभवमात्ररूप एकमात्र भावस्वरूप अर्थरहित होनेपर भी सर्वार्थरूप सकल जगत्‌ अविनाशी शान्त अद्वितीय चिन्मात्ररूप ही है। निष्क्रिय निर्विकार वह आत्मा में अपने रूपसे ही स्थित है । अचल संवित्‌ ही जैसे जैसे मन को स्थिर करके रहती है वैसे वैसे ही शीघ्र हो जाती है क्या असत्‌ है अथवा क्या सत्‌ है ? विविध शरीर, कर्म, दुःख और सुख जो कि यथास्थित हैं आयें, जायें किसका कौन विषय है और किसका कौन ग्रहण है ? इस प्रकार यह सत्‌ हो अथवा अन्यथा हो चाहे नहीं हुआ हो चाहे हो इस विषय में कौनसा आदर है ? तुच्छ फल में अवश्य फल देनेवाले यत्न का त्याग करो । तुम्हें बोध हो चुका है अब भटकने से क्या लाभ है ?