Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 146, Verse 5
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 146, verse 5 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 146 · श्लोक 5
संस्कृत श्लोक
तस्यान्तस्तत्र संप्राप्तं तदा परिणतं यदा ।
तदा तदेव सूक्ष्मोऽहमपश्यं शैलवर्षणम् ॥ ५ ॥
हिन्दी अर्थ
इसलिए बाहर अथवा भीतर जहाँ कहीं भी इन्द्रियो का प्रसार होता है वहाँ पर स्थूल जगत् दृष्टि में
आता है, ऐसा कहते है ।
जब जीव की नेत्र आदि इन्द्र्यो अत्यन्त बाह्यमय (बहिर्मुख) होती हैं तव जीव चित्त में बाह्य
जगत् का अनुभव करता है