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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 146, Verses 55–70

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 146, verses 55–70 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 146 · श्लोक 55-70

इस समूह का संस्कृत श्लोक-संरेखण अभी परिष्कृत किया जा रहा है; नीचे इसका हिन्दी अर्थ दिया गया है।

हिन्दी अर्थ

सुषुप्ति से स्वप्न में कैसे प्राप्त होता है, इस प्रश्नपर कहते हैं। जब खाया हुआ अन्न परिपाकवश पच जाता है ओर अन्नरस द्वारा किये गये गमनागमन मार्ग के निरोध की निवृत्ति हो जाने से अवकाश हो जाता है तब जीव प्राणसंचार द्वारा पुरीतत्‌ नाडी से निकलने का यत्न कर प्राण द्वारा अवबोधित हो स्वप्न देखता है । जब शरीर में परिणत हो रहे अन्नरस जिस प्रदेश में जीव के साथ नाड़ी भागों से दूसरे नाड़ी भागों में जाते हँ तब ओज के अन्दर पर्वतो की वर्षा का अनुभव करता हे । प्रचुरतम उदराग्नि से व्याप्त वातपित्त आदि के सम्बन्ध से बाहर भीतर बहुत से भ्रम देखता है, अल्पतम उदराग्नि से व्याप्त वात आदि के सम्बन्ध से अल्प भ्रम देखता हे । वात-पित्त आदि से क्षुब्ध हुए थोडे से अन्नरसों से बाहर भीतर देखता है वैसे ही बाहर भी ज्ञानेन्द्रियों से जानता है अथवा कर्मेन्द्रियों से गमन करता हे । वात, पित्त, कफ आदि से क्षुब्ध हुए थोड़े से अन्नरसों से बाहर भीतर थोड़ा-सा दृश्य भ्रान्तिवश देखता है, सम अन्नरसों से सम दृश्य देखता है ओर अत्यन्त क्षुब्ध हुए अन्नरसों से अत्यन्त भ्रमपूर्ण दृश्य देखता है। सन्निपात तथा मणि, मन्त्र, ओषध आदि निमित्तो मे कुपित हुए अन्नरसों से आवृत्त हुआ यह जीव बाहर भूमि, पर्वत ओर आकाश में हलचल देखता है अथवा अग्निराशि से उनका जलना देखता हे । अपना आकाश में उडना देखता है, चन्द्रमा, उदयाचल, हिमालय आदि पर्वतो को देखता हे, वृक्ष ओर पर्वतो की भीड़ देखता है ओर जलो का आकाश में उछलना देखता है । अथवा सागर में अपना डूबना ओर उतराना देखता हे, सुरलोक में अप्सराओं के साथ संगम देखता है ओर शेल, उपवन, शुभ्रमेघों के आसनो में बैठना तथा शुभ्रमेघों की राशि देखता है । बड़े-बड़े आरों द्वारा अपना चीरा जाना देखता है, नरको के अनुभव की भ्रान्ति देखता है ओर आकाश में ताड, तमाल ओर हिन्ताल के (छोटी जाति के खजूर के ) पेड़ों का जमघट देखता है। अपना चक्कर काटकर आकाश से नीचे गिरना ओर फिर तुरन्त आकाश में उडना देखता है, निर्जन स्थान में जनता की भीड़ लगी देखता है ओर मैदान में भी समुद्र में डूबना देखता है । और भी विचित्र विपरित व्यवहारो को देखता हे जैसे अधरात में दिन की तरह सूर्य का प्रकाश देखता है और दिन में गाढ़ अन्धकार देखता है आकाश में पर्वतो के साथ पृथिवी को देखता है, दीवार पर विशाल स्थल को देखता है, आकाश में अटारियाँ देखता हे, ओर शत्रु में मित्रता देखता है आत्मीय लोगों को परकीय समझता है तथा दुर्जन को सज्जन मानने लगता है एवं गड्ढे को समथर भूमि ओर समथर भूमि को गङ्ढा (गर्त) समझता हे । प्रतिध्वनि हो रही गानध्वनि से मनोहर, चूने से पोतकर स्वच्छ किये हुए, भाँति भाँति के चित्रों से सजेसजाये, स्फटिक या चाँदी से बने हुए या नवनीतमय (मक्खन के बने हुए) पर्वतो को देखता है । कदम्ब, धूलिकदम्ब, जंबीर के पत्ते के गुच्छों से सुशोभित घरों में अप्सराओं के साथ वैसे ही अपना विश्राम करना देखता है जैसे कि कमलों में भ्रमर भँवरियों के साथ विश्राम करता है। निद्रा में निमीलित (बन्द हुई) इन्द्रियवृत्तियाँ धातुओं के वैषम्य से भ्रान्तियों को देखती हैं, किन्तु जाग्रत में उन्मीलित (खुली हुई) ये बाहर इन्द्रजाल आदि में इन भ्रान्तियों को देखती हैं