Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 147, Verse 1
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 147, verse 1 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 147 · श्लोक 1
संस्कृत श्लोक
मुनिरुवाच ।
अनन्तरं महाबाहो सुषुप्तान्निर्गतस्य मे ।
स्वप्ने जगद्दृश्यमिदं सागरादिव निर्गतम् ॥ १ ॥
हिन्दी अर्थ
प्रसंगप्राप्त स्वप्न, सुषुप्ति ओर जाग्रत्-भेद को चुनकर फिर अवशिष्ट पूर्वकथांश को ही व्याध
पूछता है।
व्याध ने कहा : हे मुनिवर, यथार्थ में भ्रान्तिरूपी नामतः उस हृदय में उस प्राणी के ओज में बैठे हुए
आपका उसके उपरान्त कैसा स्वप्नदर्शन आदि वृत्तान्त सम्पन्न हुआ उसे कृपया बतलाइये
सर्ग सन्दर्भ
एक सौ पैंतालीसवाँ सर्ग समाप्त एक सौ छियालीसवाँ सर्ग प्रस्तुत स्वप्नदर्शन के बाद मुनि महाराज का स्वसुषुप्ति वर्णनपूर्वक स्वप्न के प्रसंग से ब्रह्मअद्वैत का विस्तार से वर्णन |