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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 147, Verse 2

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 147, verse 2 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 147 · श्लोक 2

संस्कृत श्लोक

आकाशाङ्गादिवोत्कीर्णमुत्कीर्णमवनेरिव । उत्कीर्णमिव वा चित्तादुत्कीर्णमिव वा दृशः ॥ २ ॥

हिन्दी अर्थ

मुनि महाराज ने कहा : हे व्याध, उसके वाद उस प्राणी के ओज में बैठे हुए तथा उसके जीव से मिश्रित लिंग देहवाले मेरा वर्ह पर उस समय जो वृत्तान्त हुआ उसे तुम सुनो