Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 147, Verses 3–12
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 147, verses 3–12 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 147 · श्लोक 3-12
संस्कृत श्लोक
प्रफुल्लमिव वृक्षेभ्यः सर्गः पूर्वमिवोत्थितः ।
तरङ्गजालं रोधोऽब्धेरिव वा कचनं दृशाम् ॥ ३ ॥
नभस्तलादिवायातं ककुब्भ्य इव चागतम् ।
पर्वतेभ्य इवोत्कीर्णं भूमेरिव समुत्थितम् ॥ ४ ॥
हृदयादिव निष्क्रान्तं संप्रविष्टमिवाम्बुदैः ।
प्रसूतमिव वृक्षेभ्यो जातं वा सस्यवद्भुवः ॥ ५ ॥
अङ्गेभ्य इव निर्यातं समुत्कीर्णमिवेन्द्रियैः ।
पटादिव प्रकटितं मन्दिरादिव निर्गतम् ॥ ६ ॥
कुतोऽप्यागत्य पतितमुड्डीय गगनादिव ।
उपायनं परे लोके गृहीतमिव वा भुवः ॥ ७ ॥
प्रसूनं ब्रह्मवृक्षस्य तरङ्गमिव वाम्बुधेः ।
अनुत्कीर्णप्रकटनाच्चित्स्तम्भे चारुपुत्रिका ॥ ८ ॥
आकाशमृन्मयानन्तकुड्यमाकाशपत्तनम् ।
मनो मत्तो गजमयो मिथ्या जीवस्य जीवितम् ॥ ९ ॥
अभित्तिकमरङ्गं च विचित्रं चित्रमम्बरे ।
शम्बरेशस्य सर्वस्वमविद्याख्यस्य कस्यचित् ॥ १० ॥
महारम्भं स्थिरमपि देशकालविवर्जितम् ।
नानाढ्यमपि चाद्वैतं नानात्मापि न किंचन ॥ ११ ॥
गन्धर्वपुरदृष्टान्तस्याप्यवस्तुतया समम् ।
जागरायां हि किल तद्भ्रान्तमप्युपलभ्यते ॥ १२ ॥
हिन्दी अर्थ
उस समय जब कि अति भयानक प्रलय का आडम्बर अपनी पूरी शक्ति के साथ कदम उठाये थे,
महान् पर्वतो को तिनको के समान उडानेवाला प्रलयवायु बह रहा था झटपट कहीं से पर्वतवृष्टि आ
गई । ऐसी वृष्टि कि जिसमें बड़े-बड़े वन, पर्वत, शिखर, गाँव, नगर उड रहे थे । जब मैं उस प्राणी के
ओज के अन्दर उसके जीवरूप से परिणत हुआ, उस समय सूक्ष्म परमाणुरूप मैंने वहीं पर्वतवृष्टि
देखी । उस प्राणी की नाडयो के भीतर स्थित अन्नरस के अन्तर्गत अन्न के कणरूपी पर्वतराशि से
निश्चेष्ट हुए मैंने अज्ञानतारूप अन्धता से मिश्रित गाढ सुषुप्ति का अनुभव किया । तदुपरान्त कुछ
समय तक सुषुप्ति का अनुभव कर जब प्राण के गमनागमन के मार्ग में बाधा डालनेवाला अन्न पच गया
तब प्रातःकाल में कमल के तालाब की तरह धीरे-धीरे मैं बोध की ओर अग्रसर हुआ । अन्धकार में बन्द
की हुई दृष्टि जसे चिरकाल में तेजोराशि के आभासरूप से भासित होती है वैसे ही वहाँ पर सुषुप्ति ही
आत्मस्वरूप स्वप्नता को प्राप्त हुई | सुषुप्तिरूपी विश्राम से मैं स्वप्न निद्रा को प्राप्त हुआ । जैसे समुद्र
तरंग, बुद्बुद आदि हजारों विक्षेपों से व्याप्त अपनी मूर्ति देखता हे वैसे ही मैंने भी उस समय उस प्राणी
के ओज के अन्दर हजारों विक्षेपो से युक्त दृश्य देखा। वह चिदाकाशकोशात्मक दृश्य ठीक वैसे ही मुझे
प्राप्त हुआ जैसे कि स्पन्दरहित वायु के अन्दर वायु से अभिन्न स्पन्द प्राप्त होता है । जैसे अग्नि आदि
में उष्णता अग्नि आदि से अभिन्न हे, जैसे जल आदि में स्थित तरलता जल आदि से अभिन्न हे और
जैसे मिर्च आदि में स्थित तीक्ष्णता मिर्च से अभिन्न है वैसे ही चिदाकाश से जगत् अभिन्न है । चारों ओर
फैला हुआ एकमात्र चित्स्वभावरूप होने के कारण स्वप्नजगत्रूपी दृश्य सुषुप्तिरूपी माँ के उदर से
बालक की तरह उत्पन्न हुआ हे