Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 147, Verse 15
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 147, verse 15 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 147 · श्लोक 15
संस्कृत श्लोक
नदीशैलवनादिस्थव्योमताराभ्रसंकुलम् ।
गीताब्धिरणपाठाढ्यपवनारावघर्घरम् ॥ १५ ॥
हिन्दी अर्थ
दृश्य और उसके जन्म आदि क्या वास्तविक हैं, ऐसा तुम पूछते हो या व्यवहारतः उनका क्या रूप
है, यह पूछते हो ? प्रथम पक्ष में दृश्य आदि के असत् होने से वे कुछ भी नहीं हैं, ऐसा उत्तर श्रीमुनि
महाराज देते हैं।
मुनि ने कहा : दृश्य आदि वास्तव में कुछ नहीं है घट आदि ओर जगत् आदि उत्पन्न होते हैं,
विकसित होते हैं, यह सब द्वैत से संतप्त हूए मूर्खो की कपोलकल्पनारूप प्रलाप का मैंने अनुवाद किया
है, यह कोई तात्तिक वाद नहीं है