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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 147, Verse 18

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 147, verse 18 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 147 · श्लोक 18

संस्कृत श्लोक

तां दृष्ट्वा प्राक्तनीं ग्राम्यामाहरद्वासनां बलात् । तटस्थं मुह्यमानाङ्गमिव वीचिर्महार्णवे ॥ १८ ॥

हिन्दी अर्थ

ऐसी परिस्थिति में विद्वानों की दृष्टि से अज्ञानियों की दृष्टि में प्रसिद्ध जन्म आदि किसी वस्तु की भी सिद्धि नहीं होती है, ऐसा कहते हैं। तत्त्वज्ञानी हम लोगों की दृष्टि में कुछ भी उत्पन्न नहीं होता और कुछ नष्ट भी नहीं होता सब कुछ शान्त, अजन्मा सन्मात्र है