Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 147, Verses 25–29
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 147, verses 25–29 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 147 · श्लोक 25-27
संस्कृत श्लोक
तवापि व्याध विद्धीदं बुद्धिः सत्सङ्गवर्जिता ।
द्वैतबोधेन कष्टेन कृच्छ्राच्छान्तिमुपैष्यति ॥ २५ ॥
व्याध उवाच ।
एवमेतन्मुने सत्यं पावनैस्त्वद्विबोधनैः ।
ईदृशैरपि मे बुद्धिर्न विश्राम्यति सत्पदे ॥ २६ ॥
स्यादीदृशमथो न स्यादिति संदेहजालिका ।
नैतस्मिन्स्वानुभूतेऽपि वस्तुन्यद्यापि शाम्यति ॥ २७ ॥
अहो बत दुरन्तेयमभ्याससुदृढीकृता ।
अविद्या विद्यमानैव या शान्तैव न शाम्यति ॥ २८ ॥
सत्सङ्गतैः पदपदार्थविबुद्धबुद्धेः सच्छास्त्रसत्क्रमविचारमनोहराङ्गैः ।
अभ्यासतः प्रशममेति जगद्भ्रमोऽयं नान्येन केनचिदपीति विनिश्चितिर्मे ॥ २९ ॥
हिन्दी अर्थ
सृष्टि के आरम्भ में चित् ही सकल पदार्थ रूपसे विकास को प्राप्त हुआ है प्रलयपर्यन्त वैसे ही
रहता भी है, ऐसा कहते हैं।
सृष्टि के आरम्भ में कारण का अभाव होने से चित् में जो रूप जैसे विकसित हुआ है स्वप्न और
मनोरथ के नगर के समान वह रूप प्रलय तक ज्यों का त्यों रहता है । जैसे कि बालक अपने शरीर
पर चित्रित बाघ, सर्प आदि के चित्रों से भयभीत होता है, लेकिन वयस्क पुरुष उनसे भयभीत नहीं
होता । वैसे ही अज्ञानता में द्वैतवश अन्य की भ्रान्ति से जीव आत्मभूत चेतन से ही भय खाता है,
बोध होनेपर भयभीत नहीं होता । तात्तिवक रूप से जन्म, स्थिति, विनाशशून्य असीम अत्यन्त निर्मल
ब्रह्म ही यथास्थित हो भ्रान्ति से अतिविकारी ओर नाना होकर अवभासित होता हे । प्रकाशमान
अशान्त भी यह जगत् वास्तव में प्रबोध परिशान्त ही हे