Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 148, Verses 1–14
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 148, verses 1–14 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 148 · श्लोक 1-14
संस्कृत श्लोक
व्याध उवाच ।
एवं चेत्तन्मुनिश्रेष्ठ सत्यतासत्यता कथम् ।
स्थितः स्वप्नदृशा चैष सुमहान्संशयो मम ॥ १ ॥
मुनिरुवाच ।
देशकालक्रियाद्रव्यैर्या संविन्निश्चितोदिता ।
काकतालीयवद्भाति सा सत्यस्वप्ननामिका ॥ २ ॥
मणिमन्त्रौषधिद्रव्यैः क्वचिदव्यभिचारिणी ।
क्वचित्सव्यभिचारा चित्सत्यस्वप्नाभिधा स्मृता ॥ ३ ॥
सत्यस्वप्नस्थितिर्लोकेष्वीदृग्रूपा यदा स्थिता ।
तदैषा काकतालीयन्यायादन्या न लभ्यते ॥ ४ ॥
यं यं निश्चयमादत्ते संवित्स्वदृढनिश्चया ।
तथा तथा भवत्येषा फलयुक्तस्वभावतः ॥ ५ ॥
तमेव निश्चयं त्वस्या अन्यः प्रतिनिहन्ति चेत् ।
तत्रासौ निश्चयः प्रौढः स कथं लक्ष्यभाग्भवेत् ॥ ६ ॥
न बहिर्नान्तरे सन्ति पदार्थाः केचन क्वचित् ।
संविदेका जगद्रूपैर्यथेच्छति तथा स्थिता ॥ ७ ॥
स्वप्नोऽयं सत्य इत्यन्तर्निश्चयेन तथोदिता ।
तथैवाशु भवत्येषा संशयात्संशयं व्रजेत् ॥ ८ ॥
अन्यतोऽपि फलं प्राप्तं स्वप्नसत्यत्वकल्पनात् ।
स्वप्नेन सूचितमिदं फलमित्येव वेत्त्ययम् ॥ ९ ॥
सर्व एव निजया जगत्त्रये संविदातिशयिता दृढा अपि ।
कालतो व्यभिचरन्ति देशतो यत्नतश्च चिरतोऽचिरेण वा ॥ १० ॥
सर्गादावेव चिद्व्योम भानमप्रतिघं जगत् ।
वस्तुसत्तां चिदेवातो यथेष्टं तनुते तनुः ॥ ११ ॥
चिन्मात्रं वर्जयित्वैकं ब्रह्मान्यत्सर्वदाखिलम् ।
विद्धि सत्यमसत्यं च नियतानियतं स्थितम् ॥ १२ ॥
यस्माद्ब्रह्मैव सर्वात्म सदेकमेव नेतरत् ।
तस्मात्किं नाम तत्सत्यं किमसत्यं च वा भवेत् ॥ १३ ॥
अतः स्वप्नः क्वचित्सत्यः क्वचिच्चासत्य एव वा ।
अबुद्धानां प्रबुद्धानां नासद्रूपो न सन्मयः ॥ १४ ॥
हिन्दी अर्थ
यह जगत् दृश्य सागर से लहर, मणि, मोती आदि की तरह बाहर निकला, जैसे छेनी आदि ओजारों
से तराश कर पत्थर से प्रतिमा प्रकट होती है वैसे ही आकाश से मानों यह प्रकट हुआ था, पृथिवी
से मानों निकला था, चित्त से मानों उदित हुआ था, अथवा दृष्टि से मानों प्रादुर्भूत हुआ था, वृक्षों
से मानों फूला था । सृष्टि पहले से ही स्थित थी, न कि उस समय उत्पन्न हुई ऐसा मालूम पडता
था, किनारों के निकटवर्ती सागर की तरंगराशि-सा प्रतीत होता था अथवा दृष्टयो का केशों के
गोले, द्विचन्द्र आदि रूप से कमल की तरह विकसित था, आकाश से मानों आया हुआ था, दिशाओं
से मानों उदित हुआ था, पर्वतो से मानों प्रतिमा आदि की तरह गढ़कर प्रकट हुआ था, पृथिवी से
मानों निकला था, हृदय से मानों बाहर आया था, मेघो द्वारा आकाश में मानों प्रविष्ट किया गया था,
वृक्षों से मानों पैदा हुआ था, पृथिवी से धान आदि की तरह उगा था, अंगों से मानों निकला था,
इन्द्रियों द्वारा मानों दिशाओं में लिखकर (चित्रित कर) बनाया गया था, पर्दे के भीतर से मानों बाहर
आया था, मन्दिर से मानों निकला था, कहीं से आकर आकाश से उड़कर मानों गिरा था, प्रजावर्ग
द्वारा राजा के सन्मुख रखी हुई भेट-सा था, इस लोक में संचित पुण्य जैसे परलोक मेँ अपने आप
उपस्थित होता है वैसे ही उपस्थित हुआ था अथवा खोदने आदि उपायों से हाथ लगी भूमि की निधि
की तरह हाथ में आया था, ब्रह्मरूपी वृक्षका समयपर लगे फूल की तरह समय पर उपस्थित हुआ
था, चित्रूपी खंभे में तोडने तराशने के बिना ही प्रकट हुई सुन्दर प्रतिमा था, आकाशरूप मिट्टी से
बनी हुई असंख्य दीवारों से युक्त आकाशनगर था, मनका मत्त गजमय विलास था, बिना दीवार ओर
बिना रंग के आकाश में चित्रित चित्र था, जीवका मिथ्या सर्वस्व था, माया करने मे चतुरशिरोमणि
अविद्यानामधारी किसी ऐन्द्रजालिक का उत्तम जादू था, महाविस्तार ओर चिरस्थायी दिखाई देने से
देशकाल से रहित था, वह नाना से (भेदसे) युक्त होता हुआ भी अद्वैत था, विभिन्न रूप होता हुआ
भी कुछ न था, शून्य था, अवास्तविक होने के कारण गन्धर्वनगर आदि असत् दृष्टान्तो के तुल्य था,
जो भ्रम होता हुआ भी रज्जुसर्प, मृगतृष्णाजल आदि जाग्रत में दिखलाई देते हैं उनके भी सदृश था,
केवल चितूप्रभारूप होने से आरम्भ न किया गया भी वह आरम्भ किये गये की तरह स्थित था,
देशकाल, कर्म ओर द्रव्य की सृष्टि ओर संहार से युक्त था, देवता, असुर, नर आदि से युक्त
त्रैलोक्याधार गर्भो से ओर उनके गर्भो से केले के खम्भों के समान मनोहर था । उनमें भी अवान्तर
गर्भो में अनन्त ब्रह्माण्डों की कल्पना होने से कोष्ठ में स्थित बीजराशि से भरा हुआ दाडिम के फल
की तरह था