Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 148, Verses 18–19
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 148, verses 18–19 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 148 · श्लोक 18,19
संस्कृत श्लोक
अतस्त्वं जाग्रदेवेदं स्वप्नं विद्धि महामते ।
स्वप्नं च विद्धि जाग्रत्त्वमेकमेतदजं द्वयम् ॥ १८ ॥
व्योमैवाचेत्यचिन्मात्रभानमेकमिदं ततम् ।
जाग्रत्स्वप्नसुषुप्त्याख्याः पर्यायरचना इह ॥ १९ ॥
हिन्दी अर्थ
जैसे महासागर में लहर तट में स्थित नष्ट-भ्रष्ट हो रहे अपने
प्राक्तन अंग को लाती है वैसे ही बन्धुबान्धव, स्त्री-पुत्र, घरद्वार ने मेरी पहले की ग्रामीण घर-खेल,
पुत्र-बन्धु आदि मेँ अभिमानवासना जबरदस्ती ला दी | उसके बाद उनमें आत्मीय वासनावाला मेँ
वहाँपर उनके (बन्धुवान्धव, पुत्र, स्त्री आदि के) आलिंगन से अत्यन्त सुखी हुआ, मेरी पहले की
सारी स्मृति विस्मृत हो गई