Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 148, Verse 20
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 148, verse 20 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 148 · श्लोक 20
संस्कृत श्लोक
नेह नामास्ति नियतिर्न चानियतिरस्ति च ।
नियत्यनियती ब्रूहि कीदृशे स्वप्नसंविदि ॥ २० ॥
हिन्दी अर्थ
प्रसंगतः मलिन और स्वच्छ चित् के स्वभाव का उल्लेख करते है।
जैसे लौकिक दर्पण जो जो वस्तु आगे आती है उसका प्रतिबिम्ब अपने आप स्वभावतः ग्रहण कर
लेता है वैसे ही चित्रूपी आदर्श भी वासना द्वारा उपस्थित किया गया जो जो पदार्थ अव्यवहित पूर्व में
रहता है, स्वभावतः तत्-तत् आकार धारण कर लेता हे