Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 148, Verse 21
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 148, verse 21 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 148 · श्लोक 21
संस्कृत श्लोक
यावद्भानं किल स्वप्ने तावत्सैव नियन्त्रणा ।
स एव संविद्भानस्य कुर्यान्नियमनं मुनिः ॥ २१ ॥
हिन्दी अर्थ
लेकिन स्वच्छ चित् का ऐसा स्वभाव नहीं है, ऐसा कहते है ।
किन्तु जिस चित्रूपी दर्पण को यह सब चिन्मात्र आकाश ही है ऐसा ज्ञान हो चुका, वह यहाँ वासनामय
द्वैत से (प्रतिबिम्ब ग्रहण आदि से) पीडित नहीं होता, वह केवल चिन्मात्ररूप से स्थित रहता है