Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 148, Verse 22
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 148, verse 22 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 148 · श्लोक 22
संस्कृत श्लोक
स्वच्छन्दं वातलेखायाः स्फुरन्त्याः संविदस्तथा ।
अकारणकमेवाङ्ग नियतिः केव कीदृशी ॥ २२ ॥
हिन्दी अर्थ
जिसकी बोधशालिनी अतएव निर्मल स्मृति नष्ट नहीं होती, उसे यह द्ैतरूपी पिशाच तनिक भी
दुःखी नहीं कर सकता