Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 148, Verse 28
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 148, verse 28 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 148 · श्लोक 28
संस्कृत श्लोक
जाग्रन्न संभवत्येव यज्जाग्रदिति शब्दितम् ।
स्वप्न एव जगद्रूपं निर्निद्रस्यैव चात्मनः ॥ २८ ॥
हिन्दी अर्थ
अभ्यास से अत्यन्त
बद्धमूल हुई इस अविद्या का पार पाना अत्यन्त कठिन हे । यद्यपि यह अविद्यमान ही है ओर शान्त ही है
तथापि शान्त नहीं होती