Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 148, Verses 29–34
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 148, verses 29–34 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 148 · श्लोक 29
संस्कृत श्लोक
स्वप्नो वा नाम नास्त्येव यः स्वप्न इव शब्दितः ।
सुप्तासुप्तैकरूपस्य ब्रह्मणो बोधरूपता ॥ २९ ॥
जाग्रत्स्वप्नादयो वैते न केचन कदाचन ।
दृश्यं पश्यति सत्ताशु मृतिभ्रान्तेरनन्तरम् ॥ ३० ॥
यथानवरतं कालमनन्तं सीकरोर्मयः ।
त एवान्यवदभ्राशावदनन्याः स्फुरन्त्यलम् ॥ ३१ ॥
तथानन्ये परे सर्गाः स्फुरन्त्यस्फुरिता अपि ।
शिलाकोशान्तलेखावज्जाग्रत्स्वापादि तत्र किम् ॥ ३२ ॥
जाग्रत्स्वप्नसुषुप्ततुर्यकवपुः साकारतावर्जितं सर्वाकारमपि व्यतीतकलनं सर्गं शरीरं दधत् ।
व्याप्तं चिद्वपुषा तथापि सुषिरं शून्येन दृश्यात्मना चिन्मात्रं खमिदं मनागपि नभोमात्रान्न भिन्नं पुनः ॥ ३३ ॥
साकाशानिलवह्निवारिधरणीलोकान्तराम्भोधरं सर्गादावपि कारणाननुभवाच्चित्तात्मकं केवलम् ।
नाम्ना वर्जितमेव बोधवपुषा संयुक्तमेवान्ततः शुद्धं वेदनमात्रमेव सकलं दृश्यं न वस्त्वन्तरम् ॥ ३४ ॥
हिन्दी अर्थ
तुम्हारी बुद्धि सत्संगतिशून्य है, ऐसा जो मुनिमहाराज ने कहा था, उसका भी अनुमोदन करता
हुआ कहता है।
सत् (ज्ञानप्रद) शास्त्र, उत्तम गुरुसम्प्रदाय और उत्तम विचार आदि से सर्वाग मनोहर सत्संगतियों
से उत्पन्न हुई पदपदार्थ विवेकबुद्धि के अभ्यास से उत्पन्न तत्त्वबोध से क्रमशः यह जगत्भ्रम शान्त
हो जाता है, इसके सिवा दूसरे किसी उपाय से इसकी शान्ति नहीं हो सकती, ऐसा मेरा दृढ़
निश्चय है