Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 149, Verse 14
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 149, verse 14 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 149 · श्लोक 14
संस्कृत श्लोक
स्वप्नमात्रमिदं भाति किल कस्मान्न वेत्सि भो ।
अहं स्वप्ननरो यत्ते त्वं स्वप्नपुरुषोपमः ॥ १४ ॥
हिन्दी अर्थ
इस प्रकार विचार करने पर स्वप्न भी कहीं किसी काल में सत्य और कहीं किसी काल में असत्य भी
संवित्रूप से सत्य और अन्य रूपसे असत्य है, ऐसा कहते हैं।
इन अज्ञानियों के लिए कहींपर स्वप्न सत्य ओर कहींपर असत्य ही है, किन्तु ज्ञानवान् जनों के
लिए न असद्रूप है और न सन्मय है