Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 149, Verse 2
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 149, verse 2 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 149 · श्लोक 2
संस्कृत श्लोक
मुनिरुवाच ।
ततः श्रृणु तदा साधो तस्मिंस्तद्धृदयौजसि ।
अपूर्वं एव वृत्तान्तः को वृत्तो वृत्तसस्पृह ॥ २ ॥
हिन्दी अर्थ
अधिष्ठान चित् की सत्यता से अध्यस्त में सत्यता स्वतः असत्यता दोनों जगह तुल्य ही है, तो इस
विषमता का क्या कारण है, यह भाव है।
श्रीमुनिजी ने कहा : हे व्याध, जो स्वप्नसंवित् स्वप्नेश्वरीदेवी के निकटवर्ती देश में, रात खुलते
समय तड़के, देवता की आराधना, तप, व्रत आदि कर्मो ओर हविष्य अन्न भोजन, कुशमय विस्तर
आदि द्रव्यो द्वारा शास्त्र प्रमाणों से 'इस तरह के स्वप्न का इस प्रकार का फल अवश्य होता है' यों
निश्चित उदित होती है वह संवित् उन शकुनो की तरह जिनका कि फल काकतालीय हे, उत्तरकाल में
अवश्य फललाभ होने के कारण सत्य स्वप्न नामवाली होती हे