Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 149, Verse 3
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 149, verse 3 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 149 · श्लोक 3
संस्कृत श्लोक
तथा मम च तत्रस्थविस्मृतात्मचमत्कृतेः ।
अभ्यवर्तत वै कालो ऋतुसंवत्सरात्मकः ॥ ३ ॥
हिन्दी अर्थ
लेकिन मणि, मन्त्र ओर औषधियों
से होनेवाली स्वप्नसंवित् मणि, मन्त्र आदि के योग्य पुरुषों मे अव्यभिचारिणी होती है ओर मणि आदि
के अयोग्य पुरुष में सव्यभिचारिणी होती हुई भी शास्त्रमर्यादा का उल्लंघन न करने से दोनों में सत्
स्वप्नात्मिका ही कही गई हे