Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 149, Verse 4
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 149, verse 4 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 149 · श्लोक 4
संस्कृत श्लोक
कलत्ररञ्जितमतेर्मम वर्षाणि षोडश ।
तत्र तानि व्यतीतानि गृहस्थाश्रमतोऽमतेः ॥ ४ ॥
हिन्दी अर्थ
वहाँ दोनों जनों में ही काकतालीय न्याय ही एकमात्र आसया है दष्ट किसी भी नियामक का निरूपण
नहीं किया जा सकता है, इस आशय से कहते है।
जब लोगों में सत्यस्वप्नो की स्थिति इस प्रकार की है तब यह काकतालीय न्याय के सिवा अन्य
कुछ नहीं हे