Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 149, Verse 20
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 149, verse 20 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 149 · श्लोक 20
संस्कृत श्लोक
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हिन्दी अर्थ
स्वप्न आदि के फल का नियम और अनियम भी उससे पथक् नहीं है, ऐसा कहते हैं।
यहाँ न नियति है ओर न अनियति है । जरा बतलाओ तो मिथ्याभूत स्वप्नसंवित् में नियम और
अनियम का ही कैसे संभव हो सकता है, यानी मिथ्या होने के कारण भी नियम और अनियम
अविद्यावृत चिन्मात्र से पृथक् नहीं है, यह भाव है