Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 149, Verse 19
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 149, verse 19 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 149 · श्लोक 19
संस्कृत श्लोक
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हिन्दी अर्थ
इस प्रकार अविद्याकृत चिन्मात्ररूप एक सुषुप्ति ही घृतवत् सदा द्रष्टव्य है । सभी नामरूप के भेद
उसी के पयार्य हैं ऐसा निष्कर्ष निकला, यह कहते है ।
अचेत्य चिन्मात्र भानरूप एक यह आकाश ही चारों ओर व्याप्त है। यहाँ जाग्रत, स्वप्न और सुषुप्ति
आदि उसी के नामान्तर (पर्याय) हैं