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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 149, Verse 22

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 149, verse 22 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 149 · श्लोक 22

संस्कृत श्लोक

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हिन्दी अर्थ

यदि कोई शंका करे कि संवित्‌ का पवन के समान नियमन करना अति दुष्कर है। उक्त संवित्‌ का स्वप्न आदि के आकार में स्फुरित होने का नियम है, इस पर कहते हैं। वायुलेखा की तरह स्वच्छन्द स्फुरित हो रही संवित्‌ का विषयाकार में स्फुरण होना स्वभाव नहीं है, क्योंकि सुषुप्ति मे उसका विषयाकार स्फुरण नहीं दिखाई देता । और स्वप्न में संवित्‌ के विषयाकार स्फुरण में किसी कारण का भी निरूपण नहीं किया जा सकता, जिसको कि निमित्त मानकर नियति हो, इसलिए नियति कोन ओर कैसी ?