Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 15, Verse 12
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 15, verse 12 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 15 · श्लोक 12
संस्कृत श्लोक
जगदस्त्यहमर्थेऽन्तरहमस्ति जगद्धृदि ।
अन्योन्यभाविनी त्वेते आधाराधेयवत्स्थिते ॥ १२ ॥
हिन्दी अर्थ
परस्पर बीजता का वर्णन करते हैं /
हे विद्याधर, अहंकार के अन्दर यह जगत् तथा उस जगत् के अन्दर अहंकार स्थित है ।
ये दोनों परस्पर एक दूसरे को उत्पन्न करनेवाले तथा परस्पर एक दूसरे के अधीन स्थितिवाले
हैं