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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 15, Verse 11

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 15, verse 11 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 15 · श्लोक 11

संस्कृत श्लोक

नाहंत्वजगती भिन्ने पवनस्पन्दवत्सदा । पयो द्रवत्वमिव च वह्निरौष्ण्यमिवापि च ॥ ११ ॥

हिन्दी अर्थ

पवन तथा उसके स्पन्द, जल और उसके द्रवत्व एवं अग्नि तथा उसकी उष्णता के सदृश यह अहंकार और जगत्‌ सदा अभिन्नरूप है