Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 15, Verse 10
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 15, verse 10 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 15 · श्लोक 10
संस्कृत श्लोक
अहंत्वपवनस्पन्दो जगदित्यवगम्यताम् ।
अहंत्वपद्मसौगन्ध्यं जगदित्यवबुध्यताम् ॥ १० ॥
हिन्दी अर्थ
अब दूसरी रीति से जगत् का वर्णन करते हैं /
हे विद्याधर, तुम इस जगत् को अहंकाररूपी पवन का स्पन्द समझो तथा यह भी जान लो कि
यह जगत् अहंकाररूपी कमल की सुगन्ध है