Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 15, Verse 15
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 15, verse 15 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 15 · श्लोक 15
संस्कृत श्लोक
ब्रह्मण्यतिततेऽनन्ते संकल्पोल्लेखवर्जिते ।
अहंत्वकारणाभावान्न कदाचन सन्मयम् ॥ १५ ॥
हिन्दी अर्थ
यह केसे, इस पर कहते हैं /
सर्वत्र, व्याप्त, अनन्त, संकल्पों के उल्लेखो से शून्य ब्रह्म में अहंकार का कोई कारण ही
नहीं है, अतः वह कभी भी सद्रूप नहीं है