Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 15, Verse 20
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 15, verse 20 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 15 · श्लोक 20
संस्कृत श्लोक
व्यपगतकलनाकलङ्कशुद्धः शिवमसि शान्तमसीश्वरोऽसि नित्यः ।
स्वमपि भवति पर्वतोपमानं जगदपि वा परमाणुरूपमेव ॥ २० ॥
हिन्दी अर्थ
बाह्य ओर आभ्यन्तर दुश्यप्रपंच के कल्पनारूपी कलंक से शून्य अतएव शुद्ध, शिव, शान्त,
नित्य ईश्वररूप ही तुम हो । हे विद्याधर, अध्यारोपदृष्टि से आकाश भी पर्वत के सदृश होता
है तथा अपवाददृष्टि से तो ब्रह्माण्ड भी परमाणुरूपं आकाश ही हो जाता है