Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 150, Verses 2–4
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 150, verses 2–4 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 150 · श्लोक 2-4
संस्कृत श्लोक
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हिन्दी अर्थ
मुनि ने कहा : हे सदाचार मेँ स्पृहा रखनेवाले, हे साधो व्याध, उसके पश्चात् उस
प्राणी के हृदयस्थित ओज में उस समय जो अपूर्व वृत्तान्त हुआ, उसे तुम सुनो उक्त ओज मेँ बैठने
से मेरा आत्मज्ञान का सारा वैभव विस्मृत हो गया । ऋतु, वर्ष आदिरूप समय चक्कर काट काटकर
बीतने लगा । रत्री-वच्चों पर अतिअनुराग रखनेवाले तथा आत्मा का कभी मनन न करनेवाले मेरे
वहाँपर गृहस्थाश्रम में सोलह वर्ष बीत गये