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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 150, Verse 1

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 150, verse 1 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 150 · श्लोक 1

संस्कृत श्लोक

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हिन्दी अर्थ

जैसे जलकणों की लहरें, मेघ और दिग्‌भ्रम होने पर दिशाएँ ये सब अनन्य होते हुए भी चिरकाल तक निरन्तर सर्वथा अन्यवत्‌ प्रतीत होते हैं, वैसे ही अभिन्न परम ब्रह्म मे शिला के अन्दर की रेखाओं की तरह सृष्टियाँ स्फुरित होती हैं । उनमें जाग्रत, स्वप्न आदि का कैसे संभव है 2 ॥३१,३ २॥ हे व्याध, यह आत्मस्वरूप, जो जाग्रत्‌, स्वप्न ओर सुषुप्ति स्वरूपवाला और उनसे विपरीत तुरीयावस्था स्वरूपवाला तथा आकार रहित होकर भी रूप शरीर धारण करता हुआ शून्य इस चिद्वपु से और शून्यरूप ही दृश्य से आकाशरूप छिद्र को व्याप्तकर स्थित है तथापि आकाशात्मक चिन्मात्र यह अपने शुद्ध चिन्मात्र रूप से तनिक भी भिन्न नहीं हे । आकाश, वायु, अग्नि, जल, पृथिवी, अन्यान्य लोक, मेघ आदि भूत भौतिक सहित दृश्य (जगत्‌) सृष्टि के आदि में भी दूसरे किसी भी कारण का प्रमाणो द्वारा अनुभव न होने से केवल हिरण्यगर्भचित्तात्मक हे । चित्तरूप मनोरथरूप इसके नामरूपों का अस्तित्व न होने से यह नाम से वर्जित (रहित) ही है बोधशरीरवाले मन के साक्षी से संयुक्त ही है । अन्त में मन का विलय होनेपर सारा का सारा दृश्य वेदनमात्र ही है, अन्य वस्तु नहीं है ॥३३.३४॥ एक सौ अड़तालीसवाँ सर्ग समाप्त एक सौ उनचायवाँ सर्ग पूर्वोक्त स्वप्न वृत्तान्त के सिलसिले में घर में आये हुए किसी अन्य मुनि के मुँह से श्रुत बहुत से लोगों के तुल्य (एक से) सुख, दुःख आदि के निमित्त का मुनि द्वारा कथन | व्याध ने कहा : हे महामुनिजी, आपके प्रलय आदि सैकड़ों महावृत्तान्तों के साथ अनेक सृष्टियाँ (संसार) शान्त हो चुके थे ऐसे आपका जब गृहस्थाश्रम में पुत्र-भार्या, बन्धु-बान्धव और इष्ट-मित्रों के साथ समागम हुआ तब वहाँपर अनुभव में आ रहे जगत्‌ का क्या हाल हुआ, उसका तत्त्व कृपया मुझसे कहिये